बिलासपुर में कैसी न्यायधानी? आशियाना उजाड़ने पर तैयार निगम, लिंगियाडीह की जनता 187 दिनों से सड़क पर .

बिलासपुर। विकास की अंधी दौड़ में जब सत्ता बहरी और प्रशासन असंवेदनशील हो जाए, तो जनता को सड़कों पर उतरना ही पड़ता है। न्यायधानी बिलासपुर का लिंगियाडीह क्षेत्र आज नगर निगम की तुगलकी कार्यप्रणाली का सबसे जीवंत और दर्दनाक उदाहरण बन चुका है। अपने आशियाने को बचाने के लिए यहां के रहवासी पिछले *187 दिनों* से लगातार धरने पर बैठे हैं, लेकिन निगम सरकार की कुंभकर्णी नींद टूटने का नाम नहीं ले रही है।
चुनाव के वक्त जो नेता हाथ जोड़कर वोट मांगने आते हैं, आज वे 187 दिनों से धूप-बरसात में बैठे 2000 नागरिकों का दर्द देखने क्यों नहीं आ रहे?
निगम के हुक्मरानों को जनता के सिर की छत छीनकर वहां ‘गार्डन’ उगाने की अजीब सनक सूझी है। इस तथाकथित सौंदर्यीकरण के प्रस्ताव से 150 से अधिक मकानों पर बुलडोजर चलने का संकट मंडरा रहा है, जिससे करीब 2000 लोगों का भविष्य अधर में लटक गया है।
सवाल सीधा है: निगम सरकार को जनता के आशियाने उजाड़कर कैसा ‘विकास’ दिखाना है? क्या बिलासपुर की जनता को हरियाली के नाम पर बेघर होने की सजा दी जा रही है?
निगम सरकार को यह समझना होगा कि इंसानों की लाशों और आंसुओं पर खड़े किए गए गार्डन कभी शहर की खूबसूरती नहीं बढ़ा सकते.
पीढ़ियों से रह रहे इन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की चीखें सुनने के बजाय निगम प्रशासन कागजी नक्शों में व्यस्त है। इस तानाशाही के खिलाफ अब सामाजिक और राजनीतिक संगठन भी लामबंद हो चुके हैं। स्थानीय पार्षद दिलीप पाटिल ने साफ कह दिया है कि निगम की इस ज्यादती के खिलाफ हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी जंग लड़ी जाएगी।
जनता की चीखें, बहरा प्रशासन: लिंगियाडीह में अपनों की छत छीनकर हरियाली ढूंढ रही सरकार .
फिलहाल मामला अदालत में है और अगले महीने होने वाली सुनवाई पर 2000 लोगों की सांसें टिकी हैं। देखना यह है कि कोर्ट की फटकार के बाद भी निगम सरकार की चेतना जागती है या वह अपनी हठधर्मिता पर अड़ी रहती है।




