
बिलासपुर / कोनी थाने में कानून और ईमानदारी का जो तमाशा बनाया गया है, उसने एक बार फिर पुलिस की साख पर गहरा बट्टा लगा दिया है। ट्रेलर वाहनों से डीजल चोरी करने वाले अंतर्राज्यीय गिरोह को पकड़ने का ढोंग रचने वाली कोनी पुलिस खुद ही कटघरे में खड़ी है। यह मामला अब केवल डीजल चोरी का नहीं, बल्कि वर्दी की आड़ में चल रहे ‘डीलिंग और संरक्षण’ के गंदे खेल का है।
क्या है पुलिसिया खेल?
* दिखावे की गिरफ्तारी: 12 जुलाई को कोनी पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि तीन फरार हैं।
* पर्दे के पीछे की डील: ग्रामीणों के दावों ने पुलिस की इस कहानी की धज्जियां उड़ा दीं। सच यह था कि पुलिस ने पांच आरोपियों को रंगे हाथों पकड़ा था। आरोप है कि रातभर थाने में ‘चोरों से डील’ की गई और कथित लेनदेन के बाद तीन आरोपियों को पिछले दरवाजे से छोड़ दिया गया। बाद में सरकारी कागजों में उन्हें ‘फरार’ दिखा दिया गया।
पुराना रिकॉर्ड और सुलगते सवाल
मामले में गाज गिरी है विवेचक एएसआई (ASI) उमेश उपाध्याय पर, जिन्हें एसएसपी रजनेश सिंह ने निलंबित कर लाइन हाजिर कर दिया है। लेकिन क्या केवल एक मोहरे को हटा देने से पुलिस का चेहरा साफ हो जाएगा?
उमेश उपाध्याय पहले भी लेनदेन के मामलों में सस्पेंड हो चुके हैं। ऐसे दागी पुलिसकर्मियों को बार-बार गंभीर मामलों की विवेचना सौंपना खुद पुलिस प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़े करता है। जब रक्षक ही चोरों से हाथ मिलाकर उन्हें ‘सुरक्षित विदाई’ देने लगें, तो आम जनता सुरक्षा के लिए किस पर भरोसा करे? इस सांठगांठ की तह तक जांच जरूरी है ताकि वर्दी के पीछे छिपे असली गुनहगार बेनकाब हो सकें।




