बिलासपुर केंद्रीय जेल: काल कोठरी या मौत का कुआं? एक महीने में तीसरी मौत से दहला प्रशासन,चमचमाती टाइल्स या बिछाया गया मौत का जाल?

बिलासपुर। बिलासपुर केंद्रीय जेल इन दिनों कैदियों के लिए सुरक्षित ठिकाना नहीं, बल्कि ‘डेथ ट्रैप’ साबित हो रही है। जेल की सलाखों के पीछे एक महीने के भीतर तीसरी मौत ने जेल प्रबंधन की संवेदनशीलता और सुरक्षा व्यवस्था के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं।
ताजा मामला 82 वर्षीय बुजुर्ग कैदी सोकराम साहू का है, जो हत्या के मामले में 2014 से सजा काट रहे थे। प्रबंधन के मुताबिक, 14 जुलाई की आधी रात सोकराम बाथरूम में फिसलकर गिर गए, जिसके बाद सिम्स अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। प्रशासन भले ही इसे बीमारी और हार्ट अटैक का मुखौटा पहनाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
चमचमाती टाइल्स या बिछाया गया मौत का जाल?
हैरानी की बात यह है कि बीते 29 जून को भी एक बुजुर्ग कैदी की मौत बाथरूम में फिसलने से ही हुई थी। सवाल उठता है कि क्या जेल की चमचमाती टाइल्स कैदियों के लिए काल बन रही हैं? एक महीने में दो-दो बुजुर्ग कैदियों का फिसलकर मर जाना महज इत्तेफाक है या जेल प्रशासन की आपराधिक लापरवाही?
तीखे सवाल जो जवाब मांगते हैं:
* जब कैदी पहले से शुगर, बीपी से पीड़ित था और चलने-फिरने में असमर्थ था, तो आधी रात को उसे अकेले बाथरूम जाने क्यों दिया गया?
* क्या बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की निगरानी के लिए कोई वार्डन तैनात नहीं था?
* एक के बाद एक हो रही मौतों के बावजूद जेल के भीतर सुरक्षा ऑडिट क्यों नहीं किया गया?
यह लगातार तीसरी मौत जेल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गहरा कलंक है। बीमार कैदियों को भगवान भरोसे छोड़कर जेल प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि यह प्राकृतिक मौतें हैं या व्यवस्था द्वारा किया गया ‘सिस्टमैटिक मर्डर’।




