बिलासपुर

गई भैंस पानी में! 17 करोड़ की पार्किंग बनी ‘शो-पीस’, सड़कों पर कब्जा और सो रहा प्रशासन .

बिलासपुर।विकास के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाना कोई बिलासपुर के नीति-निर्माताओं से सीखे। एसपी ऑफिस के ठीक सामने लगभग 16 करोड़ 88 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से चमचमाता ‘मल्टीलेवल कार पार्किंग’ खड़ा तो कर दिया गया, लेकिन आज यह करोड़ों का प्रोजेक्ट सिर्फ एक बेजान ‘शो-पीस’ बनकर रह गया है। नेहरू चौक, कलेक्टोरेट और तंग सड़कों को ट्रैफिक जाम से मुक्ति दिलाने का दावा करने वाली यह मल्टीलेवल पार्किंग खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।
अधिकारियों के गढ़ में यातायात ठप्प, रसूखदारों को खुली छूट
विडंबना देखिए, जिस वीवीआईपी रोड पर आईजी कार्यालय, कलेक्टर व एसपी ऑफिस, महापौर बंगला और माननीय न्यायालय स्थित हैं, वहीं नाक के नीचे दिनभर ट्रैफिक रेंगता है। रसूखदार और आम नागरिक गाड़ियां पार्किंग के अंदर खड़ी करने के बजाय सड़कों पर ही लावारिस छोड़ जाते हैं। हालात इतने बदतर हैं कि खुद बड़े अफसरों को जाम से बचने के लिए दूर-दराज के रास्तों से घूमकर जाना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिलासपुर का प्रशासनिक अमला गहरी नींद में सो रहा है?
गरीबों पर डंडा, रसूखदारों पर रहम!
स्थानीय जनता में इस दोहरी व्यवस्था को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का सीधा आरोप है कि नगर निगम और यातायात पुलिस का सिंघम रूप सिर्फ ठेले-खोमचे वाले गरीबों और छोटे दुकानदारों पर ही चलता है। उनका चालान काटने और उन्हें खदेड़ने में मुस्तैद रहने वाले अधिकारियों को सड़कों पर अवैध रूप से पार्क चमचमाती कारें दिखाई नहीं देतीं।

साफ शब्दों में कहें तो “गई भैंस पानी में!” जनता के 17 करोड़ रुपये बजट के नाम पर ठिकाने लगा दिए गए, लेकिन नतीजा सिफर है। जब न अधिकारियों को नियम मनवाने की परवाह है और न ही नागरिकों में नागरिक बोध, तो इस सफेद हाथी को खड़ा करने का क्या औचित्य था? जवाबदेही तय होनी ही चाहिए!

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