सर्पदंश फर्जीवाड़ा: मोटी तनख्वाह के बाद भी रिश्वतखोरी कफन चोर बने ‘सफेदपोश’ सिम्स की डॉक्टर और बाबू गिरफ्तार ..

बिलासपुर : सरकारी खजाने को दीमक की तरह चाटने वाले भ्रष्टाचारियों पर बिलासपुर पुलिस ने एक और बड़ा प्रहार किया है। फर्जी सर्पदंश (सांप काटने) से मौत दिखाकर शासन से मुआवजा हड़पने के घिनौने खेल में पुलिस ने सिम्स की तत्कालीन चिकित्सक डॉ. प्रियंका सोनी और तहसीलदार कार्यालय के बाबू हरिशंकर राठौर, गरीब राम बिंझवार व नरेंद्र कौशिक को सलाखों के पीछे भेज दिया है। कोर्ट ने चारों को जेल का रास्ता दिखा दिया है।
जांच में खुलासा हुआ कि इन ‘सफेदपोश’ गिद्धों ने दो अलग-अलग मामलों में फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जाली दस्तावेज तैयार किए, ताकि मृतकों के परिजनों को 4-4 लाख रुपये का सरकारी मुआवजा दिलाया जा सके। इस महा-फर्जीवाड़े में पुलिस अब तक वकीलों और परिजनों समेत 12 से अधिक आरोपियों को अंदर कर चुकी है, जबकि मास्टरमाइंड वकील श्रवण वस्त्रकार अभी भी फरार है। जिले में ऐसे 16 संदेहास्पद मामलों की फाइलें दोबारा खंगाली जा रही हैं।
जनता का सुलगता सवाल: क्या सिर्फ छोटी मछलियां ही फंसेंगी?
इस कार्रवाई के बाद जनता के बीच आक्रोश और चर्चाएं गर्म हैं। लोगों का सीधा सवाल है कि हर महीने मोटी सैलरी और भत्ते डकारने के बाद भी इन अधिकारियों और बाबुओं की रिश्वतखोरी की भूख शांत क्यों नहीं होती? क्या इन्हें कफन के पैसों में भी अपना हिस्सा चाहिए?
सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था पर है—क्या यह कानूनी हंटर सिर्फ इन छोटी मछलियों (बाबुओं और डॉक्टरों) पर ही चलेगा? क्या इस नेक्सस के पीछे बैठे असली ‘मगरमच्छ’ (उच्च अधिकारी और रसूखदार नेता) हमेशा की तरह अपना जाल काटकर साफ बच निकलेंगे और मोहरों को आगे कर खुद महफूज रहेंगे? प्रशासन दांव तो बड़े-बड़े खेल रहा है, लेकिन देखना यह है कि जांच की आंच उन मगरमच्छों के आलीशान दफ्तरों तक पहुंचती है या नहीं।



