रैन बसेरा नहीं ‘रेंग बसेरा’, जमीन पर अंधेर नगरी; तिफरा बस स्टैंड अपनी बदहाली पर रो रहा आंसू! .

बिलासपुर। न्यायधानी बिलासपुर इन दिनों 45 डिग्री की भीषण गर्मी में भट्टी की तरह तप रही है। आसमान से बरसती आग और थपेड़े मारती लू के बीच प्रदेश का ‘पहला हाईटेक’ तिफरा बस स्टैंड अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। करोड़ों की लागत से बना यह बस स्टैंड आज यात्रियों के लिए किसी टॉर्चर रूम से कम नहीं है। विडंबना देखिए कि व्यवस्था दुरुस्त करने का दम भरने वाला प्रशासन एसी कमरों में दुबका है, और जनता बाहर बेहाल है।
12-12 लाख के ताले, सिस्टम पर सवाल
फरवरी 2024 में तत्कालीन कलेक्टर अवनीश शरण ने बड़े तामझाम के साथ निरीक्षण किया था। घोषणा हुई कि रात में रुकने वाले यात्रियों, खासकर महिलाओं को सुरक्षित ठिकाना देने के लिए दो रैन बसेरे बनेंगे। करीब 24 लाख रुपए फूंक दिए गए, रैन बसेरे बनकर तैयार भी हो गए, लेकिन आज तक इनके तालों को खुलने की ‘सरकारी फुर्सत’ नहीं मिली। नतीजा? हर दिन 500 बसों से आने-जाने वाले हजारों यात्री, बुजुर्ग और महिलाएं खुले आसमान के नीचे इस जानलेवा गर्मी में रात बिताने को मजबूर हैं। मस्तूरी में लू से हुई बुजुर्ग की मौत भी क्या प्रशासनिक नींद उड़ाने के लिए काफी नहीं हैं ?
कागजों में हाईटेक, जमीन पर ‘अंधेर नगरी
* नशेड़ियों का ‘सरकारी’ परमिट: रात होते ही जिस रैन बसेरे में महिलाओं को सुरक्षित होना था, वहां असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों का कब्जा हो जाता है। सुरक्षा सिर्फ फाइलों में बंद है।
* रात 9 बजे ‘सुलभ’ पर ताला: अजीब विडंबना है, बसें रात 11 बजे तक आ रही हैं, लेकिन यात्रियों के लिए बने सुलभ शौचालय रात 9 बजे ही बंद कर दिए जाते हैं। क्या प्रशासन चाहता है कि यात्री खुले में जाएं?
कड़वा सच:करोड़ों की योजनाएं, लाखों के रैन बसेरे और खोखले दावे… तिफरा बस स्टैंड का यह हाल चीख-चीख कर कह रहा है कि जनता के टैक्स का पैसा किस तरह लापरवाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। शासन-प्रशासन की इस ‘ठंडी’ कार्यप्रणाली ने जनता को इस ‘गर्म’ मौसम में मरने के लिए छोड़ दिया है। आखिर इस सिस्टम की जवाबदेही कब तय होगी?




