डॉक्टरों की लुट मरीजो में हलकान मेडिकल वालों की मरना दवाई mrp का जाल …

बिलासपुर:अस्पतालों के आईसीयू और वार्डों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे मरीजों के लिए आज बीमारी से भी ज्यादा जानलेवा दवाओं का बिल बन चुका है। डॉक्टरों की कमीशनखोरी, कॉर्पोरेट अस्पतालों की साठगांठ और दवा माफियाओं का सिंडिकेट मिलकर बेबस मरीजों को दिनदहाड़े लूट रहा है। इस संगठित डाके पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताते हुए केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों से जवाब तलब किया है कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज में मरीजों से 10 गुना ज्यादा एमआरपी (MRP) वसूल कर दिनदहाड़े यह लूट क्यों मचाई जा रही है?
अस्पतालों में ‘सफेदपोश डाका’, MRP का खूनी खेल और सुप्रीम कोर्ट का चाबुक: ₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में! आखिर कब जागेगी सरकार?
₹2,700 की दवा पर ₹27,000 का ठप्पा!
जो कैंसर-रोधी दवा या इंजेक्शन बाजार में महज ₹2,700 की लागत में उपलब्ध हो सकता है, उस पर ₹27,000 का एमआरपी प्रिंट करके मरीजों को बेचा जा रहा है। एमआरपी का यह कानूनी जाल अब मरीजों की जेब काटने और उनकी सांसें तोड़ने का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है। इस अंधाधुंध मुनाफाखोरी से न केवल आम आदमी अपनी जीवनभर की कमाई लुटाकर कंगाल हो रहा है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं को भी भारी चपत लग रही है।
NPPA के ढीले नियम और लूट का सरकारी ढांचा
देश में दवाओं की मनमानी कीमतों पर लगाम कसने की जिम्मेदारी NPPA (राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण) की है, लेकिन उसके नियम ही इस लूट का रास्ता खोलते हैं। दवाओं को दो श्रेणियों में बांटा गया है:
* शेड्यूल दवाएं (Scheduled Drugs): इनके दाम NPPA तय करता है और कंपनियां मनमर्जी रेट नहीं बढ़ा सकतीं।
* नॉन-शेड्यूल दवाएं (Non-Scheduled Drugs): इन पर कोई सख्त प्राइस कैपिंग नहीं होती। सर्जिकल सामान, महंगे इंजेक्शन और कैंसर की ज्यादातर दवाएं इसी ढील का शिकार हैं।
ब्रांडेड बनाम जेनेरिक और अस्पतालों का मोनोपोली सिंडिकेट
लूट का सबसे बड़ा खेल ब्रांडेड और जेनेरिक के नाम पर खेला जा रहा है। जेनेरिक दवाएं और महंगी ब्रांडेड दवाएं साल्ट और असर में 100% एक जैसी होती हैं, लेकिन डॉक्टर और अस्पताल सिर्फ वही ब्रांडेड दवा लिखते हैं जिस पर उन्हें मोटा कमीशन मिलता है।
हद तो तब हो जाती है जब जो दवा खुले बाजार में सस्ती मिलती है, वही दवा अस्पताल के अंदर बने मेडिकल स्टोर पर 4 से 5 गुना महंगे दामों पर अनिवार्य रूप से थमाई जाती है। मरीज के पास बाहर से दवा खरीदने का विकल्प तक छीन लिया जाता है।
सवाल सरकार और सिस्टम से:
मरीजों की मजबूरी और आंसुओं पर पल रहे इस सफेदपोश काले कारोबार पर सरकार आखिर कब सख्त चाबुक चलाएगी? क्या इंसान की जिंदगी से बढ़कर दवा कंपनियों का मुनाफा हो गया है? जब तक एमआरपी के इस खूनी खेल और कमीशनखोरी के सिंडिकेट को ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक हर रोज कोई न कोई मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ता रहेगा।




