बिलासपुर

स्वास्थ्य व्यवस्था पर कलंक: 84 हजार के बिल के लिए लाश बंधक, लुटेरे अस्पतालों और कमीशन सिंडिकेट का नाच …

बिलासपुर: स्वास्थ्य सेवा के नाम पर बिलासपुर में चल रहा निजी अस्पतालों और एंबुलेंस चालकों का कमीशनखोरी का धंधा अब पूरी तरह ‘आदमखोर’ रूप ले चुका है। मध्य प्रदेश के शहडोल और कोरिया जैसे दूर-दराज़ इलाकों से उम्मीद लेकर आने वाले गरीब-आदिवासी मरीज इन सफेदपोश डकैतों का आसान शिकार बन रहे हैं।
हालिया घटना तोरवा क्षेत्र स्थित हरिओम मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल की है, जिसने इंसानियत को पूरी तरह शर्मसार कर दिया। पेड़ से गिरकर गंभीर रूप से घायल हुई 46 वर्षीय आदिवासी महिला तिलबसिया को बेहतर इलाज का झांसा देकर इस नए खुले अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के नाम पर मनमाना बिल बनाया गया और 28 जुलाई को मौत के बाद जब गरीब परिजन 84 हजार रुपये का भारी-भरकम बिल नहीं चुका सके, तो अस्पताल प्रबंधन ने निर्दयता की हद पार करते हुए शव को ही बंधक बना लिया!
जिस अस्पताल में एक अदद मॉर्च्युरी तक की व्यवस्था नहीं है, वहां मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर सिर्फ तिजोरियां भरी जा रही हैं। कांग्रेस नेताओं के भारी हंगामे और दबाव के बाद भले ही शव सौंपा गया हो, लेकिन डॉक्टर अभिषेक कश्यप और अस्पताल प्रबंधन की सफाई इस संस्थागत लूट और लापरवाही को छिपा नहीं सकती।
कमीशन का यह सिंडिकेट मरीज नहीं, लाशें ढूंढता है:
* एंबुलेंस कट-प्रथा: बड़े और स्थापित अस्पतालों को छोड़कर मरीज को सीधे इस अस्पताल क्यों लाया गया? क्या एंबुलेंस चालकों की जेब में जाने वाला मोटा कमीशन मरीज की जान से बढ़कर है?
* शव पर सौदेबाजी: इलाज के नाम पर लूटने के बाद मौत पर भी बिल वसूली के लिए शव रोकना किसी आपराधिक षड्यंत्र से कम नहीं है।
यह मामला सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, बल्कि डॉक्टरों और एंबुलेंस चालकों के उस खूनी गठजोड़ का है जो गरीबों की लाचारी पर फलता-फूलता है। अगर स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन ने गहरी नींद से जागकर ऐसे कसाईखानों पर एफआईआर दर्ज कर इनके लाइसेंस रद्द नहीं किए, तो जनता का इस लचर और बिकाऊ स्वास्थ्य व्यवस्था से भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा!

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