करोड़ों का खेल, अंधेरे में जनता: क्या कागजी दावों से रोशन होगा बिलासपुर …

बिलासपुर: ‘स्मार्ट’ बनने का ढोंग करने वाले बिलासपुर नगर निगम की पोल बहतराई नाग-नागिन तालाब (वार्ड 49) के अंधेरे ने पूरी तरह खोल दी है। जिस नगर निगम में साफ-सफाई और मेंटेनेंस के नाम पर हर महीने 3.5 से 4.31 करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, क्या नगर निगम में 10 बल्ब नहीं बची है! पिछले एक महीने से इलाका अंधेरे में डूबा है, लोग रातों में सांप-बिच्छुओं के खौफ में जी रहे हैं, और सामने देश का सबसे बड़ा त्योहार खड़ा है। लेकिन जनसुविधा के बड़े-बड़े दावे करने वाले अफसर कुंभकर्णी नींद में सोए हैं।
निगम का आलम यह है कि जवाबदेही लेने के बजाय अफसरशाही और नेतागीरी एक-दूसरे पर गेंद फेंकने में मस्त हैं। कर्मचारी इन्जीनियर नीलेश का कहना है कि शासन को चिट्ठी भेजी है, अप्रूवल आ गया है लेकिन लाइट नहीं आई। स्टोर प्रभारी नंदेश्वर पल्ला झाड़ते हुए कहते हैं कि मुझे कोई जानकारी नहीं, पार्षद से बात करें। वहीं पार्षद सुनील सोनकर का कहना है कि जानकारी दे दिया हु लाइट आने में अभी 10 से 12 दिन और लगेंगे।
जनता का सीधा सवाल है—जब आपात स्थिति में 10 लाइटें बदलने की औकात इस निगम की नहीं है, तो मेंटेनेंस के करोड़ों रुपये आखिर किसकी तिजोरी में समा रहे हैं? क्या अधिकारी-कर्मचारी केवल अपनी जेबें भरने और सैलरी उठाने के लिए बैठे हैं? अगर एक मामूली लाइट के लिए महीने भर तरसना पड़े, तो ऐसे नकारे और लाचार तंत्र से जनता आखिर क्या उम्मीद रखे? अब देखना यह है कि अफसरों की ज़मीर जागती है या बिलासपुर की जनता ऐसे ही उनके भ्रष्टाचार और नाकामी का अंधेरा ढोने को मजबूर रहेगी!




