यातायात की नजर केवल चालान पर लेफ्ट फ्री के बाद भी सिग्नल का इन्तजार …

बिलासपुर की सड़कों का हाल यह है कि यहाँ गाड़ियां कम और लोगों का सब्र ज्यादा रेंगता है। तोरवा इलाके में चले जाइए, लगेगा जैसे पूरी दुनिया की गाड़ियां यहीं आकर रिटायरमेंट ले रही हैं। घंटों से जाम में फंसे लोग धुएं के गुबार में मुँह ढके सोचते रहते हैं कि आज घर पहुँचेंगे या सीधे अगले जन्म में!
सबसे मज़ेदार (या यूँ कहें कि रुलाने वाला) तमाशा ‘लेफ्ट फ्री’ वाली लेन पर होता है। कायदे से बाएं मुड़ने वालों को सीधे निकल जाना चाहिए, लेकिन वहां कोई न कोई ‘महानुभाव’ गाड़ी तिरछी करके ऐसे खड़े रहते हैं मानो पूरा रोड उनके ससुराल का हो। नतीजा? पीछे वाले बेवजह हॉर्न बजा-बजाकर अपना बीपी बढ़ाते हैं और सिग्नल लाल से हरा होने का इंतज़ार करते हैं। फिर शुरू होती है सड़क छाप तीखी बहस, जिसे देखकर लगता है कि ट्रैफिक पुलिस नहीं, तो कम से कम मुक्केबाज़ी संघ को यहाँ रेफरी भेज देना चाहिए!
दूसरी तरफ़ अपनी खाकी वर्दी वाली पुलिस की फुर्ती देखने लायक है। चकरभाठा और हिर्री थाना इलाके में पुलिस वाले ऐसे छिपकर चेकिंग करते हैं जैसे सरहद पर घुसपैठिए पकड़ रहे हों। चालान काटने और रसीद फाड़ने में जो तेज़ी दिखाई जाती है, काश उसकी 10% फुर्ती जाम खुलवाने में दिखा दी जाती! जनता अब सरेआम पूछ रही है—“साहब, पुलिस का काम शहर चलाना है या सिर्फ पुलिस का खजाना भरना?”
तमाशा अपनी जगह है, लेकिन डरावना सच यह है कि इसी अंधी भीड़ के बीच अगर कोई एम्बुलेंस सायरन बजाते हुए फंस जाए, तो उसकी चीख सुनने वाला कोई नहीं है। अगर जाम के चक्कर में किसी की सांसें अटक गईं, तो क्या पुलिस चालान की रसीद पर ‘सॉरी’ लिखकर देगी?




