
रतनपुर: सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच पिसते एक बेबस किसान की यह कहानी पूरे प्रशासनिक ढर्रे पर करारा तमाचा है। खसरा नंबर 883/19 और 883/20 में अपनी ही जमीन गंवाने के बाद, पिछले 10 सालों से एक किसान मुआवजे की कौड़ी-कौड़ी के लिए दफ्तरों की धूल छान रहा है। खसरा नंबर 883/19 का पूरा मुआवजा गायब है, तो 883/20 के करीब 2 लाख रुपये पर ‘सिस्टम’ कुंडली मारकर बैठा है।
हैरानी की बात यह है कि मामला प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंचा और वहां से जांच के निर्देश भी आए, लेकिन अफसरशाही के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। तहसील, एसडीएम और कलेक्टोरेट के अनगिनत चक्कर काटकर किसान थक चुका है। इस प्रशासनिक बेदर्दी के बीच त्रासदी यह है कि किसान के पिता कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे हैं। इलाज के लिए पैसे की सख्त जरूरत है, लेकिन कागजी फाइलों के जाल में हक की रकम फंसी हुई है।
किसान ने पटवारी पर आरोप लगाया है कि मुआवजे के बदले कथित तौर पर जमीन की रिश्वत मांगी गई। मांग पूरी न करने की सजा आज पूरा परिवार भुगत रहा है। बिलखते किसान ने कलेक्टर संजय अग्रवाल के सामने अपना दर्द बयां किया, जिसके बाद जांच का आश्वासन मिला है।
लेकिन सवाल जस का तस है—जो जांच 10 साल में पूरी नहीं हो सकी और जिस फाइल को PMO के निर्देश भी नहीं हिला पाए, क्या वह कलेक्टर के आश्वासन से जागेगी? कैंसर से दम तोड़ती उम्मीदें और घूसखोरी के दलदल में फंसा न्याय, इस बात की गवाही दे रहा है कि आम आदमी के लिए इंसाफ आज भी फाइलों में दफन है।




